सुख वो अहसास हैं जो हमें किसी भी चीज़ की प्राप्ति होने पर होता हैं। सुख किसी न किसी प्राप्ति से जुड़ा होता हैं।

प्राप्ति किस चीज़ की हैं वह सुख को इन्द्रिय या अतीन्द्रिय सुख बनाता हैं। संसार से जुड़ी प्राप्तियां जैसे धन, घर, पद आदि इन्द्रिय सुख देती हैं और अगर प्राप्ति का आधार आत्मिक गुणों पर है जैसे शान्ति, प्रेम आदि तो उसे अतीन्द्रिय सुख कहते हैं।

वास्तव में इन्द्रिय सुख में जो सुख मिलता है वह भी कहीं ना कहीं आत्मिक गुणों की तलाश के कारण ही है। हम धन, पद आदि में सम्मान, प्रेम, शक्ति आदि को ही खोजते है।

इसी तरह किसी भी चीज़ की अप्राप्ति या उसके खो जाने पर दुख का अहसास होता है।

आनंद वो स्थिति हैं जब प्राप्ति पर निर्भरता नहीं रह जाती। अप्राप्ति कभी थी, इसका बोध भी नही रह जाता। इतना सुख मिला कि अब कुछ और प्राप्ति हो इसकी भी इच्छा नहीं।

जैसे एक वृक्ष फूल या फल तब देता है जब जीवित रहने की उसकी मूल जरूरत से ज्यादा उसे मिला हो। जो अधिक मिला था वह फल या फूल बन जाता है। इसलिए आनंदित व्यक्ति छुप नही सकता, नाचता हुआ लगता है। क्योंकि जो अधिक मिला, वो बह रहा है। मेरे पापा कहते थे कि खुशी में ख़गिया मारते है, बिना मारे रह नही सकते।

और यही कई कारणों में से एक कारण हैं कि धार्मिक लोग सुख की बात ज्यादा करते हैं और आध्यात्मिक व्यक्ति आनंद की।

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